सिंगोली CHC को 50 बेड की ‘कागजी सौगात’, पर कड़वा सच—10 डॉक्टरों के पद पर सिर्फ 2 चिकित्सा अधिकारियों का पहरा।
विधायक सखलेचा की पहल पर 50 बिस्तर और 15 करोड़ मंजूर, मगर जनता का तीखा सवाल- ‘साहब! जब स्वीकृत सेटअप के सारे 6 विशेषज्ञ और 2 मेडिकल अफसर ही गायब हैं, तो नई दीवारों से इलाज कैसे होगा?
सिंगोली।
नीमच जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर सरहद पर बसे सिंगोली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) को लेकर सरकार की नीति और नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्षेत्रीय विधायक और पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सखलेचा के प्रयासों से इस अस्पताल को 30 बेड से अपग्रेड कर 50 बिस्तरों वाले ‘सिविल अस्पताल’ की मंजूरी तो मिल गई है और 15 करोड़ का भारी-भरकम बजट भी प्रस्तावित कर दिया गया है।
लेकिन मैदानी हकीकत का कड़वा विश्लेषण यह है कि स्वास्थ्य विभाग ने यहाँ की 1 लाख जनता को केवल ‘भवन की सौगात’ थमा दी है, इलाज की नहीं।
आंकड़ों का गणित
*आधे से ज्यादा स्टाफ गायब, डॉक्टरों की कुर्सियां सूनी
!शासकीय नियमों के अनुसार सिंगोली का यह अस्पताल वर्तमान में 30 बेड के मापदंड पर संचालित है। इसके लिए सरकार ने बकायदा 46 से 52 पदों का पूरा स्टाफ सेटअप स्वीकृत कर रखा है।
कड़वी हकीकत इस पूरे सेटअप में से वर्तमान में केवल 24 पदों पर ही कर्मचारी नियुक्त और कार्यरत हैं। आधे से अधिक पद खाली पड़े हैं।
डॉक्टरों का टोटा

सबसे बदतर स्थिति डॉक्टरों की है
नियमों के मुताबिक यहाँ 6 विशेषज्ञ डॉक्टर (सर्जन, फिजिशियन, स्त्री रोग, बाल रोग विशेषज्ञ आदि) और 4 मेडिकल ऑफिसर (कुल 10 डॉक्टर) होने चाहिए। लेकिन वर्तमान में सभी 6 विशेषज्ञों और 2 मेडिकल अफसरों के पद खाली हैं। पूरा अस्पताल सिर्फ 2 डॉक्टरों के भरोसे रेंग रहा है।
दोहरी मार

हर दिन 200 की ओपीडी
सरहद पार राजस्थान से भी आते हैं मरीज
सिंगोली ब्लॉक की भौगोलिक स्थिति बेहद संवेदनशील है। यह अस्पताल मध्य प्रदेश और राजस्थान के अंतर-राज्यीय मार्ग को छूता है।यहाँ प्रतिदिन 150 से 200 मरीजों की भारी ओपीडी होती है।नीमच जिला मुख्यालय से 80 किमी की भारी दूरी होने के कारण, सिंगोली ब्लॉक की 1 लाख आबादी के साथ-साथ पड़ोसी राज्य राजस्थान के सीमावर्ती गांवों के सैकड़ों गरीब ग्रामीण भी इसी अस्पताल के भरोसे रहते हैं।अंतर-राज्यीय मार्ग होने के कारण यहाँ आए दिन भीषण सड़क हादसे होते हैं, जिनके घायलों को आपातकालीन इलाज के लिए सबसे पहले यहीं लाया जाता है।
आक्रोश: ‘रेफरल केंद्र’ बन चुका है अस्पताल, रास्ते में टूटती हैं सांसें!अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ और सर्जन न होने का सबसे बड़ा खामियाजा प्रसूताओं (गर्भवती महिलाओं) और दुर्घटना के घायलों को काटना पड़ता है।
मामूली सी आपातकालीन स्थिति आते ही, यहाँ मौजूद दो डॉक्टर और सीमित स्टाफ प्राथमिक उपचार देकर मरीज को 80 किलोमीटर दूर नीमच या राजस्थान के कोटा/भीलवाड़ा के लिए रेफर कर देते हैं। कई बार गंभीर मरीज जिला अस्पताल पहुंचने से पहले रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
जनता की खरी-खरी: ‘भवन बाद में तानना, पहले डॉक्टर दो
क्षेत्र के नागरिकों और जागरूक जनप्रतिनिधियों का साफ कहना है कि वे विधायक सखलेचा के 50 बेड की मंजूरी के प्रयासों का स्वागत करते हैं,
*लेकिन सरकार का यह कदम “घोड़े के आगे गाड़ी बांधने”* जैसा है। जनता की मांग है कि 15 करोड़ की लागत से बनने वाली नई बिल्डिंग को तैयार होने में सालों लगेंगे, लेकिन आज जो मरीज बिना इलाज के मर रहे हैं, उन्हें बचाने के लिए वर्तमान स्वीकृत 10 डॉक्टरों के सेटअप में से तत्काल रिक्त पद भरे जाएं या जिला अस्पताल से रोटेशन पर विशेषज्ञों की ड्यूटी लगाई जाए।
